उत्तराखंड की पावन धरा अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सुरम्य पर्वतों और पावन परंपराओं के लिए जानी जाती है। आज के आधुनिक दौर में हमारी लोक बोलियाँ, पारंपरिक त्यौहार, लोक कलाएँ और प्राकृतिक जल स्रोत लुप्तप्राय होने की कगार पर हैं।
‘यूथउत्तराखंड’ का “हमारी संस्कृति, हमारी पहचान” अभियान एक ऐसा प्रयास है जो हमारे युवाओं और बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ता है, लोक कलाओं को पुनर्जीवित करता है और हमारी प्राकृतिक जल धरोहरों को सहेजने का संकल्प लेता है। हमारी संस्कृति केवल हमारी प्राचीन परंपराएं या रीति-रिवाज नहीं हैं, बल्कि यह हमारी जीवनशैली, जीवन मूल्यों और उस गौरवशाली पहचान की नींव है जो हमें समाज में एक सूत्र में पिरोती है। अपनी जड़ों से जुड़े रहना और अपनी सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजना ही किसी भी समाज की असली ताकत होती है।
ग्रीष्मकालीन बोली कक्षाएं (Summer Camps): बच्चों और प्रवासियों के लिए कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी बोलियों की व्यावहारिक कक्षाएं।
खेल-खेल, लोक कथाओं और बाल गीतों के माध्यम से अपनी मातृभाषा बोलने की झिझक मिटाना
नौला स्वच्छता एवं जीर्णोद्धार अभियान: प्राकृतिक जल स्रोतों (Aquifers) की सफाई, मरम्मत और जल पूजन।
वैज्ञानिक व सांस्कृतिक चेतना: बच्चों को नौलों के धार्मिक, वैज्ञानिक और जल-संरक्षण महत्व से परिचित कराना।
युवाओं और महिलाओं के लिए 1-दिवसीय व बहु-दिवसीय ऐपण कला (Aipan Art) कार्यशालाएं।
ऐपण को स्वरोजगार, आधुनिक उत्पादों (कैनवास, टी-शर्ट, डायरी) और डिजिटल आर्ट से जोड़ना।
फूलदेई, हरेला, घी संक्रांति, सातूं-आठूं और इगास-बगवाल जैसे लोक पर्वों का सामूहिक आयोजन और दस्तावेजीकरण।
उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत उसके पारंपरिक त्यौहारों और लोक पर्वों में झलकती है। यह त्यौहार प्रकृति के प्रति आभार, ऋतु परिवर्तन और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक हैं।
फूलदेई (Phool Dei):
समय: चैत्र माह के प्रथम दिन (मार्च के मध्य)।
महत्व: इसे बच्चों का त्यौहार या ‘बसंतोत्सव’ भी कहा जाता है। छोटे बच्चे घरों की देहरी (चौखट) पर ताजे फूल और चावल चढ़ाते हैं तथा सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
हरेला (Harela):
समय: सावन संक्रांति (जुलाई के मध्य)।
महत्व: यह हरियाली, कृषि और प्रकृति संरक्षण का त्यौहार है। इस दिन सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं, जिन्हें ‘हरेला’ कहा जाता है। उत्तराखंड में इसे पर्यावरण दिवस के रूप में भी मनाया जाता है और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाता है।
घी संक्रांति / ओलगिया (Ghee Sankranti):
समय: भादों माह के प्रथम दिन (अगस्त के मध्य)।
महत्व: यह अच्छी फसल और पशुधन के लिए आभार व्यक्त करने का पर्व है। इस दिन घी खाना और एक-दूसरे को भेंट स्वरूप स्थानीय उत्पाद या उपहार (ओलग) देना शुभ माना जाता है।
भिटौली (Bhitauli):
समय: चैत्र माह (मार्च-अप्रैल)।
महत्व: यह मायके पक्ष द्वारा विवाहित बेटियों को प्रेम और सम्मान स्वरूप उपहार, मिठाई और कपड़े भेजने की एक अनूठी परंपरा है।
गंगा दशहरा (Ganga Dussehra):
समय: ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (मई-जून)।
महत्व: इस दिन पवित्र नदियों (विशेषकर गंगा) में स्नान का विशेष महत्व है। घरों के द्वारों पर ‘दशपत्र’ (विशेष धार्मिक आलेख) लगाए जाते हैं।
इगास-बगवाल (Igas Bagwal):
समय: मुख्य दीपावली के 11 दिन बाद (कार्तिक शुक्ल एकादशी)।
महत्व: यह उत्तराखंड की लोक दीपावली है। इस दिन ‘भैलो’ (चीड़ की लकड़ी की मशाल) खेला जाता है, दिए जलाए जाते हैं और पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं।
उत्तराखंड के यह पर्व न केवल हमारी परंपराओं को जीवित रखते हैं, बल्कि पर्यावरण और प्रकृति के साथ हमारे अटूट रिश्ते की भी याद दिलाते हैं।
‘यूथउत्तराखंड’ का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक चेतना फैलाना ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर ऐसे ठोस प्रयास करना है जिससे हमारी भावी पीढ़ी अपनी जड़ों, बोलियों और परंपराओं से सहजता से जुड़ सके।इसी सोच के तहत शिविरों (Camps / छुट्टियों) के दौरान बच्चों के लिए उत्तराखंड की क्षेत्रीय बोलियों—कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी—की विशेष कक्षाओं और कार्यशालाओं का आयोजन
‘एडॉप्ट ए नौला’ (Adopt a Naula): युवा टीमे अपने गाँव या क्षेत्र के पुराने नौले-धारों की सफाई, रंग-रोगन और पौधे लगाने का जिम्मा लें।
वाटर वॉक (Water Walks): बच्चों को प्राकृतिक जल स्रोतों के पास ले जाकर उन्हें उनके निर्माण की तकनीक और जल संरक्षण का महत्व सिखाएं।
पारंपरिक खेल प्रतियोगिताएं: ‘भैलो’, पतंगबाज़ी या स्थानीय पारंपरिक खेलों का आयोजन।
उत्तराखंड कल्चरल क्विज़ (Online & Offline): त्योहारों (जैसे इगास, फूलदेई, नौला पूजा) और इतिहास पर आधारित क्विज़, जिसमें विजेताओं को प्रोत्साहन पुरस्कार दिए जाएं।
“मेरी बोली, मेरा अभिमान” शॉर्ट्स/रील्स: बच्चों से कुमाऊंनी, गढ़वाली या जौनसारी में 30-सेकंड के छोटे वीडियो/रील्स बनवाना जिसमें वे किसी नौले, पहाड़ या त्यौहार के बारे में बताएं।
डिजिटल स्टोरीटेलिंग: हमारी लोक कथाओं (माधो सिंह भंडारी, जीतू बगड़वाल) को कॉमिक्स, एनिमेशन या इंफोग्राफिक्स के रूप में सोशल मीडिया पर साझा करना।
‘पहाड़ी ज़ायका’ कुकिंग वर्कशॉप: बच्चों को झंगोरे की खीर, अरसा, डुबुक, भांग की चटनी जैसे व्यंजन बनाने की आसान विधियां सिखाना।
ऐपण (Aipan) और कला कार्यशाला: स्कूली बच्चों के लिए ऐपण कला, पिरुल (Pine Needles) से सजावटी सामान बनाने की ट्रेनिंग देना।
‘यूथउत्तराखंड’ का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक चेतना फैलाना ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर ऐसे ठोस प्रयास करना है जिससे हमारी भावी पीढ़ी अपनी जड़ों, बोलियों और परंपराओं से सहजता से जुड़ सके।इसी सोच के तहत छुट्टियों के दौरान बच्चों के लिए उत्तराखंड की क्षेत्रीय बोलियों—कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी—की विशेष कक्षाओं और कार्यशालाओं का आयोजन
जड़ों से जुड़ाव: प्रवासियों व स्थानीय बच्चों को अपनी मातृभाषा/बोली सीखने और बोलने में झिझक मिटाना।
संस्कृति का संरक्षण: घटती बोलचाल के बीच कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी बोलियों को व्यवहार में बनाए रखना।
रचनात्मक विकास: बच्चों को खेल-खेल, लोक कथाओं और संगीत के माध्यम से अपनी संस्कृति से परिचित कराना।
उत्तराखंड में नौले (पारंपरिक जल स्रोत): बच्चों में जल संरक्षण एवं सांस्कृतिक चेतना का विकास
उत्तराखंड के ग्रामीण एवं पर्वतीय जीवन में ‘नौला’ केवल पीने का पानी प्राप्त करने की जगह नहीं है; यह हमारी स्थापत्य कला, पर्यावरण विज्ञान और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। बच्चों को नौलों के महत्व से जोड़ना वास्तव में उन्हें जल संरक्षण और अपनी सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करने का संस्कार देना है।
जल साक्षरता और पर्यावरण चेतना: बच्चों में बचपन से ही प्राकृतिक जल स्रोतों (Aquifers/Groundwater) को प्रदूषण से बचाने और पानी की हर बूंद का सम्मान करने की आदत डालना।
पारंपरिक ज्ञान और विज्ञान से परिचय: बच्चों को यह समझाना कि हमारे पूर्वजों द्वारा बिना किसी आधुनिक तकनीक के बनाए गए ये जल स्रोत किस प्रकार वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल हैं।
संस्कृति और जड़ों से जुड़ाव: नौले के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व (जैसे जल पूजन, मांगलिक कार्य) से भावी पीढ़ी को परिचित कराना।
उत्तरदायित्व की भावना: बच्चों को केवल जल का उपभोक्ता न बनाकर, अपने आसपास के प्राकृतिक संसाधनों का ‘संरक्षक’ बनाना।
उत्तराखंड की गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर, पारंपरिक त्यौहारों, लोक बोलियों (कुमाऊंनी, गढ़वाली, जौनसारी), पारंपरिक कला (ऐपण) और जीवनदायिनी जल धरोहरों (नौले व धारे) के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए ‘यूथउत्तराखंड’ द्वारा एक विशेष जनजागरण अभियान चलाया जा रहा है।
यदि आप अपनी सेवाओं, समय और कौशल के माध्यम से योगदान देना चाहते हैं, तो आप निम्नलिखित भूमिकाओं में हमारे साथ जुड़ सकते हैं:
ग्राउंड वालंटियर (जमीनी स्तर पर):
गाँवों और कस्बों में नौला स्वच्छता एवं संरक्षण अभियान (निःशुल्क श्रमदान) में भाग लेना।
बच्चों व युवाओं के लिए आयोजित होने वाले ग्रीष्मकालीन शिविरों (Summer Camps) और वर्कशॉप्स के संचालन में मदद करना।
मेंटर / भाषा व कला शिक्षक:
बच्चों को कुमाऊंनी, गढ़वाली या जौनसारी बोलियों के बुनियादी शब्द, लोक कथाएं या बाल गीत सिखाना।
युवाओं को पारंपरिक ऐपण कला का प्रशिक्षण देना।
डिजिटल एवं कंटेंट वालंटियर:
सोशल मीडिया पोस्ट, इंफोग्राफिक्स, रील्स और वीडियो बनाकर हमारी संस्कृति व अभियान का प्रचार-प्रसार करना।
प्रवासी परिवारों तक इस अभियान का संदेश पहुँचाना।
आपकी सहयोग राशि और संसाधन सीधे बच्चों के शिक्षण, वर्कशॉप सामग्री और जल स्रोतों के जीर्णोद्धार पर उपयोग किए जाते हैं:
ऐपण व कला किट स्पॉन्सरशिप: बच्चों के लिए गेरू, बिस्वार/एक्रिलिक रंग, ब्रश, कैनवास और एमडीएफ बोर्ड आदि की किट उपलब्ध कराना।
नौला पुनरुद्धार एवं सफाई सामग्री: नौला स्वच्छता अभियान हेतु दस्ताने, कूड़ेदान, सुरक्षा उपकरण, चूना (सफेदी) और चौड़ी पत्ती वाले पौधों (बांज, आंवला) की व्यवस्था में सहयोग।
बच्चों के लिए अध्ययन सामग्री: बोली कक्षाओं के लिए रंगीन वर्कबुक, फ़्लैश कार्ड्स और प्रोत्साहन पुरस्कार/प्रमाणपत्र प्रायोजित करना।
कार्यक्रम प्रायोजन (Event Sponsorship): 1-दिवसीय नौला व ऐपण वर्कशॉप या ग्रीष्मकालीन शिविर के जलपान व आयोजन व्यय में सहयोग।
जुड़ने का संकल्प: “जब जुड़ेगा युवा, तभी बचेगी संस्कृति और समृद्ध होगा हमारा उत्तराखंड।”
ऑनलाइन गूगल फॉर्म: स्वयंसेवक पंजीकरण या सहयोग हेतु ऑनलाइन फॉर्म भरें। – Click here
संपर्क माध्यम: हमारी टीम से सीधे व्हाट्सएप/कॉल या सोशल मीडिया पेजों के माध्यम से ।
हमारा संकल्प: “तन, मन और धन के छोटे-छोटे प्रयासों से ही हमारी समृद्ध संस्कृति और धरोहरें सुरक्षित रहेंगी।”
“हम संकल्प लेते हैं कि हम अपनी पवित्र देवभूमि की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, महान परंपराओं और प्राकृतिक धरोहरों पर गर्व करते हैं। हम अपनी मातृभाषा व बोलियों का आदर,लोक कलाओं का संरक्षण,जल व पर्यावरण धरोहरों की रक्षा,लोक पर्वों व संस्कृति का संवर्धन,हम समाज में पर्यावरण संरक्षण, भाईचारे और सांस्कृतिक चेतना का विस्तार करेंगे तथा आने वाली पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़कर एक आत्मनिर्भर और संस्कारी समाज का निर्माण करेंगे।हमारी संस्कृति ही हमारी जीवनशैली है, और हमारी परंपराएं ही हमारी असली पहचान हैं। अपनी जड़ों को सींचना और इस धरोहर को सहेजना ही हमारा परम कर्तव्य है